सावित्रीबाई फुले : भारत की पहली महिला अध्यापिका

 

 

सावित्रीबाई का जन्म महाराष्ट्र के ‘सतारा’ जिले में 3 जनवरी 1831 को एक शूद्र परिवार में हुआ था। अपने पति और साथी ‘ज्योतिबा फुले’ के साथ मिलकर उन्होने 1847 में दलितों के लिए पहला स्कूल खोला। 1848 में उन्होने लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला। उन्होने अपने जीवन में कुल 18 स्कूल खोले। इनमें से एक स्कूल में अधेड़ उम्र के और बुजुर्ग लोगो को भी शिक्षा दी जाती थी। जाहिर है उस वक्त उन्होने इसके लिए सवर्णो का काफी विरोध झेला। शुरु में जब उनके स्कूल में दलित और महिलाएं आने से हिचक रहे थे और स्कूल में संख्या काफी कम थी तो सावित्रीबाई ने शिक्षा और सामाजिक आन्दोलन के बीच के सम्बन्ध को पहचाना और वे ज्योतिबा फुले के साथ विभिन्न मोर्चो पर ‘महिला सम्मान’, ‘महिला अधिकार’ और ‘दलित अधिकारों’ के आन्दोलन में अपनी सीधी हिस्सेदारी की। और शिक्षा तथा सामाजिक आन्दोलन एक दूसरे से गुंथ गये। सावित्रीबाई ने अपने नेतृत्व में उस वक्त नाइयों को संगठित किया कि वे विधवाओं के बाल ना काटे। उस समय प्रथा थी कि पति के मरने के बाद पत्नी को गंजा रहना होगा।

उस समय विधवायें अनेक तरह के यौन उत्पीड़न का शिकार होती थी। फलतः प्रायः वे गर्भवती हो जाती थी लेकिन समाज के डर से उन्हे या तो अपने बच्चे को मारना पड़ता था या फिर उन्हे खुद आत्महत्या करनी पड़ती थी। इससे निपटने के लिए सावित्रीबाई ने अपने घर पर ही ‘बालहत्या प्रतिबन्धक गृह’ की स्थापना की जहां ऐसी महिलाओं को अपने बच्चे को जन्म देने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था। और उन्हे दुबारा से सम्मानजनक जीवन जीने का हौसला दिया जाता था। यहां न सिर्फ दलित महिलाएं बल्कि ब्राहमण विधवा महिलाएं भी आती थी। ऐसी ही एक ब्राहमण विधवा के पुत्र को सावित्रीबाई ने गोद भी लिया।

इन सब लड़ाइयों और सामाजिक कामों से ही उन्हे शिक्षा का उद्देश्य भी समझ आया जो उनकी कविताओं में बहुत स्पष्ट तरीके से आया है। ऐसी ही एक कविता में वे कहती है-

‘‘आपको सीखने-पढ़ने का अवसर मिला है

तो सीखो-पढ़ो और जाति के बंधन को काट दो।’’

यानी यहां शिक्षा महज ‘अक्षर ज्ञान’ या ‘पोथी ज्ञान’ नहीं है, बल्कि सामाजिक अन्तरविरोधों को हल करने और समाज को आगे की ओर एक धक्का देने के लिए है।

मशहूर पुस्तक ‘उत्पीडि़तों का शिक्षाशास्त्र’ के लेखक ‘पावलो फ्रेरे’ भी शिक्षा को उत्पीडि़तों के ‘चेतना निर्माण’ से जोड़ते है जो उत्पीड़ित को न सिर्फ अपने बन्धनों के प्रति सचेत करता है वरन उसे काटने की चेतना का भी निर्माण करता है।

इसी सन्दर्भ में सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा फुले दोनो ही वेदों को ‘आलसी की कल्पना’ और ‘झूठी चेतना का रूप’ मानते थे जो दलितो-महिलाओं की चेतना पर एक बोझ है। और इसे उतारकर फेंक देना चाहिए।

ज्योतिबा फुले की मृत्यु के समय सावित्रीबाई फुले ने ही उनकी चिता को अग्नि दी थी। यह उस समय के लिए (आज के लिए भी) बहुत ही क्रान्तिकारी कदम था।

महाराष्ट्र में जब ‘प्लेग’ की बीमारी फैली तो सावित्रीबाई फुले जी-जान से प्रभावित लोगों की सेवा में लग गयी। और प्लेग से प्रभावित एक बच्चे की सेवा करते हुए ही उन्हे भी प्लेग हो गया और इसी से उनकी 10 मार्च 1897 को मौत हो गयी।

उनके साथ ही याद करना ज़रूरी है सावित्री बाई की सहयोगी शिक्षिका फ़ातिमा शेख को, जो उनके साथ साथ ही शिक्षा की अलख जगा रही थी।

उन माताओं पिताओं को समझाने में फ़ातिमा शेख का योगदान बहुत महत्वपूर्ण था जो अपनी पिछड़ी सोच के कारण लड़कियों को स्कूल नहीं भेजना चाहते थे।

मनीष आजाद

० Manish आज़ाद

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