प्रयागराज 25 जनवरी, सुंदरता तो सिर्फ चेतना की होती है, निर्मल चित्त की होती हैं। शरीर तो कुरुप है, मल मूत्र का घर है। इसे सजने संवारने और सुंदर बनाने के धोखे में मत पड़ना उक्त बातें प्रबुद्ध फाउन्डेशन के प्रबंधक/सचिव उच्च न्यायालय के अधिवक्ता आईपी रामबृज ने एक विज्ञप्ति जारी कर बताई।
आईपी रामबृज ने बताया कि तथागत बुद्ध कहते हैं- हर पल यह ध्यान रखो, शरीर के प्रति बोध रखो कि शरीर नश्वर है, एक दिन मिट्टी में मिल जाना है। इसे निर्मल, निरोग रखो। इसको निखारने से कोई लाभ नहीं। जरा विचार करो, यह देह तो कुरुप है, यह तो बाल, नख, दांत, मांस, हड्डी, यकृत, फेफड़े, आंत, पित्त, कफ, रक्त, पसीना चर्बी, लार और मल मूत्र का घर है। ऐसी चीजों से भरे हुए शरीर में भला सौंदर्य कैसे हो सकता है?
आईपी रामबृज ने आगे बताया कि मनुष्य चाहे लाख कोशिशें करें, आकर्षक वस्त्र पहने, महंगे गहने पहने, कितने ही इत्र सुगंधी छिड़के लेकिन इसकी दुर्गंध नहीं जाती। कितने ही हीरे जवाहरात पहनने के बाद भी अंदर के मांस, हड्डी, रक्त, पसीना, मवाद, लार वैसी की वैसी ही रहती हैं।
आईपी रामबृज ने निष्कर्ष बताते हुये कहा कि शरीर की नश्वरता और असली सौंदर्य को जानना है, अनुभव करना है तो ध्यान का अभ्यास करो। कायानुपश्यना का अनुभव करो, फिर सच को जानकर सजने संवरने पर कभी ध्यान नहीं दोंगे। साधारण मनुष्य इच्छाओं, कामनाओं वासनाओं से भरा रहता है, वह अपने बाहरी शरीर को वस्त्र, आभूषण, इत्र आदि से श्रंगार कर दूसरों को आकर्षित करता है और स्वयं भी इसी आधार पर आकर्षित होता हैं। न भोजन के प्रति संयम है न इच्छाओं पर. शरीर रोगों से भरता जाता है लेकिन वस्त्र, आभूषण, सौंदर्य प्रसाधन और सुख सुविधाएं बटोरने में रात दिन लगा रहता है।
आखिर मन से निर्मल, शील सदाचार से पूर्ण, प्रेम करुणा मैत्री से भरे , सहज सरल विनम्र व्यक्ति को सजने संवरने की क्या जरूरत है, ये गुण ही तो उसका सौन्दर्य हैं। यदि कोई स्त्री या पुरुष कितना ही रूपवान हो लेकिन यदि वह घृणा, लोभ, काम, क्रोध, हिंसा और अहंकार से भरा हो और जब विकराल हो जाता है तो उसकी बाहरी सुंदरता की सारी पोल खुल जाती हैं. वह किसी को प्रिय नहीं लगता और कोई व्यक्ति रुपवान नहीं है लेकिन प्रेम, करुणा, मैत्री, विनम्रता, शील, सदाचार के भावों से भरा हुआ है तो वह सभी को सुंदर व प्रिय लगता है।
भगवान बुद्ध बार बार चेतावनी देते हैं- शरीर को सुंदर बनाने की व्यर्थ कोशिश मत करो, शरीर तो प्राकृतिक रूप से कुरुप ही है. सौंदर्य तो चेतना का है, निर्मल चित्त का है, शील सदाचार का है, प्रेम करुणा और मैत्री का है. और इससे आगे असली सौंदर्य तो निर्वाण का है.











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