"लोकसेवक" या जनप्रतिनिधि 


  चौकीदार का पद ग्राम- सभाओं में अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध  जनता में पनपते आक्रोश को कलेक्टर तक  पहुंचाने के लिए बनाया गया था । ईस्ट इंडिया कंपनी से उठ कर जब महारानी विक्टोरिया  का शासन सन् 1958 में समस्त हिंदोस्तां में लागू हुआ तब भी इस पद-धारक को ग्राम में हुये अपराधों की विवेचना में एक मुखबिर के तौर पर  असल अपराधी तक पहुंचने में एक महत्वपूर्ण  कडी की तरह प्रयोग किया जाता था। चौकीदार प्रशासनिक व्यवस्था का लघुतम् पर मजबूत लोकसेवक हुआ  करता  था । आज के संवैधानिक भारत की कानून व्यवस्था में ग्राम प्रधान तो एक "लोक सेवक" माना है पर चौकीदार का न तो वह पद ही कायम रहा और न ही प्रधानी का पद कोई "लाभ का पद" घोषित किया गया है ।
     अंग्रेजों द्वारा ही बनाई गयी भारतीय दण्ड संहिता की धारा 21 में दी गयी 'लोक सेवक' की परिभाषा को हमने ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया। केवल उनके नियंत्रक अधिकारी के पद पर चयन लोक सेवा आयोग के माध्यम से आई सी एस की जगह आई ए एस और आई पी की जगह आई पी एस का संवर्ग बना कर मेरिट के आधार पर लोक सेवकों का चयन होने लगा। धरातल पर कोई सुधार नहीं हुये, फलत: लोक सेवक के प्रति जो निष्पक्ष भाव था वह नौकरशाही के राजनीतीकरण की ओर मुड़ गया और राजनीतिक हालात यहां तक पहुंच गये कि जो देश के सर्वोच्च गणतांत्रिक संस्था का उच्चतम् जनप्रतिनिधि  है, उसी को "चौकीदार " कहा जाने लगा। पूर्व में उस पदधारक को सम्मानजनक शब्द लगा कर संबोधित किया जाता था परन्तु आज एक जन प्रतिनिधि ही दूसरे जनप्रतिनिधि को नौकरशाही के निम्नतम पदधारक के नाम से संबोधित कर जनतंत्र को कमजोर कर फिल्मी अंदाज में "जो है नाम वाला ,वही तो बदनाम है" की  आभासी दुनिया की ओर धसीट रहा है। उल्लेखनीय होगा कि इसी भारत में कौटिल्य के समय सरकारी सेवक को "राजपुरूष" कहा जाता था और राजा स्वयं भेष बदल कर जनहित में प्रजा के कार्य एक लोकसेवक की भांति किया करता था पर कोई उसे एक "संरक्षक" के आदरभाव से ही देखा जाता था। 
     भारतीय दण्ड संहिता में यदि कोई अपराध लोकसेवक द्वारा किये जाते हैं  तो आधी और यदि जनता द्वारा लोकसेवक के प्रति किये जायें तो दोगुनी सजा का प्राविधान है पर इस ओर किसी भी जनप्रतिनिधियों की नजर अंग्रेजों की बनायी संहिता पर इस असमान   दण्ड विधान की ओर नहीं गयी ।
 इन जनप्रतिनिधियों में इस बात पर ले कर विवाद रहा कि उन्हें भी "लोकसेवक" समझा जाय पर उनकी हीन व भ्रांति भावना को तब विराम लगा जब  सर्वोच्च न्यायालय ने ही उनके बचकाने बोध को ठुकरा दिया कि जनप्रतिनिधि को हम  "लोकसेवक " नहीं मान सकते तथापि वे इस प्रधानमंत्री के सर्वोच्च गरिमामय पद को  "चौकीदार" कहने से बाज नहीं आये तथा उसके आगे विशेषण लगा कर भोली भाली जनता की पुष्टि भी करते हुये देखे गये।
      "लोकसेवक" के प्रति भ्रांतियों के चलते जन सामान्य में एक बात और फैलायी जाती रही कि प्रत्येक जन सेवक क्योंकि जनता के दिये कर से वेतन पाता है अतः प्रत्येक  जन उसका "मालिक" है और  लोकसेवक  उनका व्यक्तिगत सेवक। इससे बडा मिथ्या ज्ञान कदाचित कोई दूसरा नहीं हो सकता ।इसी कुचक्रीय वाममानसिकता के चलते, स्थान-स्थान पर लोकसेवकों को  कार्यालय में बंद करने व घेराबंदी किये जाने की धटनाओं को भी अंजाम दिया जाता रहा । लोकसेवक अपने वरिष्ठों के आदेशों व शासन के बनाये  नियमों  से अपने पद पर बंधा है। उसका वेतन सरकार उससे वांछित सेवा लेकर ही देती है , लोकसेवक  किसी व्यक्ति विशेष के आदेशों से नहीं बंधा होता परंतु वह जनता के प्रति सही दृष्टिकोण और संवेदनापूर्ण व्यवहार प्रदर्शित करने के नियमों से जरूर बंधा है । जनता को यह भी जानना होगा कि एक लोकसेवक जनता को यदि नुक्सान विद्वेषपूर्ण हो कर पहुंचाता है तो वह कानूनी संरक्षण को खो देता है।
 लोकसेवक सरकारी कोष से वेतन प्राप्त करता है ,न कि किसी प्राइवेट व्यक्ति के बैंक खाते से। यह भ्रांति भी उसी प्रकार वामपंथी विचारधारा से उद्भूत हुयी है जिसके अंतर्गत कोई प्राइवेट श्रमिक यह सोचने लगे कि दुकानदार को हुये लाभ में उसका पूरा हक है क्योकि यदि वह न होता तो दुकानदार अपनी दुकान कैसे चला पाता।
  हम कहते तो हैं  कि भारतीय प्रजातंत्र की जडें बहुत मजबूत  है पर  वे बस पांच साल में  शासन उलट देने भर तक ही सीमित लगती हैं। जब हम बारीकी से अध्ययन करते हैं तो यही पाते हैं कि वे स्वस्थ लोकतंत्र की बुनियाद क्या है और हमारा उनके प्रति सही नजरिया क्या होना चाहिए , इतना भी पिछले 70 वर्षों में न समझ सके।  तब हम अपने को  लोकतंत्र के स्तर पर  बच्चे जैसा अबोध और नाबालिग ही पाते हैं। 

   प्रदीप कुमार अग्रवाल 
    मो 9082893377

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