सुनो मेरे देशवासियों
कैसा काला दिन आया था
13 अप्रेल को इसी दिन
जलियाँबाग में मातम छाया था
जिस मंजर को देख के
पत्थर दिल तक भी भरमाया होगा
अंग्रेजी शासन भी इस
डायर की करतूतों से शरमाया होगा
जब गूँज रही थीं लाखों
आवाजें इंकलाब का नारा था
जलियाँ वाला बाग सभा में
आजादी लेंगे सबने यही पुकारा था
उम्मीदों का लगा था मेला
पर पल भर में लाशों के ढेर लगे
बच्चे बूढ़े औरत दूधमुंहे
अकाल काल के ग्रास बने
सहम उठा तब सारा भारत
जलियाँ वाला बाग जला
निर्दोष निहत्थे बेचारों पर
ऐसी आयी बुरी बला
इतिहास स्वयं काला दिन ये
निर्मम नरसंहार लिख रहा था
जान बचाने की खातिर
रस्ता तक नहीँ दिख रहा था
करुण पुकार मची थी बस
ऐसा मातम पसरा था
लाशों के ढेर पड़े थे बिखरे
कुआँ भी उनसे पडा़ भरा था
उस दुष्ट डायर के सीने में
पत्थर कोई उतरा होगा
ऊधम सिंह वीर के मन में
बदले का भाव उभरा होगा
आओ शीश झुकाएं उनको
विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित कर दें
आओ भाव सुमन बरसायें
शत शत नमन समर्पित कर दें ।
✍️...पदमावती 'पदम'
आगरा ।












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