जंग से इंसानियत का दामन कब तक होगा छलनी?  - शेखर चन्द्र जोशी, प्रोफेसर एवं कलाकार 


    युद्ध आखिर कब तक चलेंगे रूकेंगे? इससे पहले कोरोना महामारी फैली। वाह रे मानव! हम जंगली ही अच्छे थे, जब मैं कहता हूं, तो आप कह सकते हैं कि यह कैसा जंगली है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के इस समय में भी जंगल की बात करता है। विकास के इस दौर में कुछ देर के लिए कंप्यूटर आदि पर इंटरनेट के माध्यम से चल रही प्रणाली- रेलवे, हवाई सेवा और मुद्रा बाजार आदि ठप हो जाएं, तो सब कुछ धरा का धरा रह जाता है।       
    युद्ध मानव के अहं-विध्वंस और विजय की कहानी के साथ-साथ अनगिनत निर्दोष मानवों की विविध आकांक्षाओं को सदा-सदा के लिए दफ्न कर जाने वाली दास्तान भी हैं। विल्हेम हेनरिक ओटो डिक्स एक ख्यात जर्मन चित्रकार और प्रिंट मेकर थे। प्रथम विश्व युद्ध के रणक्षेत्र में भयंकर मानव संहार को उन्होंने अपनी आंखों से देखा था, जिससे उनकी कल्पना शक्ति आजीवन आहत रहीय उनको सब जगह दुख, आतंक और विनाश ही दिखाई देता था। (तब कैमरे भी न थे) आज तो सब कुछ सैटेलाइट द्वारा आसानी से देखा जा सकता है, और दिखाया भी जा रहा है। तब उन्होंने मृत शरीरों, कंकालों और खून-कीचड़ से लथपथ रणक्षेत्र की खाइयों की ‘एंग्रेविन्ज’ को युद्ध (1924) शीर्षक से पुस्तक रूप में प्रकाशित कराया था। 
    युद्ध के विनाशकारी तत्वों को समाज के सम्मुख रखकर उसकी भर्त्सना में  पिकासो द्वारा सन 1937 में बनाया गया गुएर्निका  एक प्रतीकात्मक चित्र है। अपने चित्र के संबंध में पिकासो बताते थे कि इसमें बैल का चित्रण तानाशाही के प्रतीक के रूप में किया गया है, बल्कि वह पाशविक अत्याचार व अन्याय का प्रतीक है। घोड़ा जनता का प्रतीक है। इसी समय साल्वाडोर डाली ने ‘गृह युद्ध की पूर्व सूचना’ (1936) व ‘जलता हुआ जिराफ’ (1935) में यर्थाथ के पीछे छिपे घृणास्पद सत्य-सृष्टि का खून, हत्या व सड़न को चित्रित करके युद्धों की भयानकता का प्रत्यक्ष दर्शन कराने की कोशिश की थी। इस क्रम में रूसो का चित्र युद्ध भी रखा जाता है।
    प्रथम विश्व युद्ध 1914 से 1918 तक और द्वितीय विश्व युद्ध 1939 से 1945 तक चला। आंकडे बताते हैं कि इन महायुद्धों में सैनिकों और नागरिकों सहित संसार भर में लगभग 10 करोड़ लोगों की मृत्यु हुई और साढ़े चार करोड़ से अधिक लोग जख्मी हुए। कई लाख लोग लापता भी हुए। ईरान-इराक युद्ध 1980 से 1988 तक चला। वियतनाम युद्ध बहुत लंबा लगभग 20 वर्षों तक चला। सबसे लंबा 44 वर्षों तक चलने वाला शीत युद्ध (कोल्ड वार) तो संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ व उनके सहयोगियों, पश्चिमी ब्लाक और पूर्वी ब्लाक के बीच भू-राजनीतिक तनाव की एक ऐसी अवधि थी, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद शुरू हुई थी। इन युद्धों के परिणामस्वरूप ही पोलैंड, पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि अलग-अलग देश बने। कोरिया भी उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के रूप में तीन साल 1950 से 1953 तक हुए युद्ध के उपरांत पृथक हुए।
    हम भूल नहीं सकते कि अमेरिका ने क्रमशः 6 और 9 अगस्त, 1945 को कैसे जापानी शहरों हिरोशिमा और नागासाकी पर दो परमाणु हमला किया था, जिनमें लगभग चार लाख लोग मारे गए थे। इनमें अधिकांश नागरिक थे। परमाणु बम गिराया जाना विधि के विरूद्ध है, यह न्यायालय भी मानता था। वह यह भी साफ-साफ कहता है कि युद्ध में नागरिकों को आवश्यकता से अधिक कष्ट नहीं पहुंचाया जाना चाहिए। युद्ध में जहर और गैस के प्रयोग को वर्जित किया जाना चाहिए, क्योंकि ये परमाणु बम से अधिक कष्टकारी हैं, इसलिए इन सबका पूर्ण रूप से प्रतिबंधित होना आवश्यक है। 
    युद्ध आमने-सामने होता है, जैसा कि प्राचीन जमाने में होता था। इसके भीतर दया, धर्म तथा वीरता का भाव परिलक्षित  होता था। युद्ध के भीतर या दौरान अमानवीय कृत्य कतई क्षमा के योग्य नहीं हैं। इसे वीभत्स नहीं बनाया जाना चाहिए। युद्ध में असैन्य क्षेत्रों पर आक्रमण से भी बचना चाहिए। युद्धबंदियों के साथ और युद्ध क्षेत्र से शरण के लिए भाग रहे लोगों के उत्पीड़न से बचना चाहिए। 
    सवाल यह भी है कि युद्ध में युद्ध की खातिर आखिर सैनिक भी क्यों कर मारे जाएं? उन्हें जोश दिलाकर, उनकी मौत पर बिगुल बजाकर और राष्ट्रीय ध्वज ओढ़ाकर हम क्या संदेश देना चाहते हैं, जबकि देश के बेगुनहगार अन्य नागरिक भी इन युद्धों में बेमौत मरते हैं। युद्ध के निवारण के लिए मध्यस्थता और बातचीत का रास्ता ही सदा होना चाहिए, जिसके लिए अब लोग भारत की ओर मुंह ताक रहे हैं। युद्ध सदा के लिए रूकने चाहिए। मानव, प्रकृति और समाज के विनाश को रोकना आज अत्यंत आवश्यक है।
साभार - हिन्दुस्तान समाचार पत्र 

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